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अवधी किस्सा : 1 - रेल कै अविस्मरणीय यात्रा | Awadhi Kissa Kahani : A Memorable Train Journey

अवधी किस्सा : 1

रेल कै अविस्मरणीय यात्रा | A Memorable Train Journey

2011 मा हम बेंगलुरु से आपन गांव जात रहे। टेरेनिया बेंगलुरु स्टेशन से चली मुला हमरे आस पास कुछ सीट खाली रही। जइसने अगिला स्टेशन आवा, सब सीटियां भरी गयीं।

कुछ बेर भय सब यात्री एक दूसरे के मोहना ताकत रहेन मुला कुछ घंटा बाद एक यात्री हमसे पूछिस - "आप कहा तक जाएंगे?"

हम ओहका बताये - प्रतापगढ़ तक। ई सुनि के ऊ बोलिस - "अच्छा! हमका तौ अमेठी जाए का अहै, मतलब आप हमसे पहिलेन उतर जइहें।"

ई बतिया सुनि के बाकी दुइ जाने और कहें की हम सब तौ आपौ से पाहिले उतर जाउब, हमका इलाहबाद जाए का अहै। अब हम सबै कै आपस मा परिचय होइ चूका रहन औ सब एक दुसरे के नाम पूछ लेहे रहेन।

धीरे धीरे दुपहर होइ गय। संझा होत-होत जोन दुइ जने आपस मा दोस्त रहेन, उन्मैं से एक जने कहें - "का हो तास कै पत्तवा निकारि का? आवा तीन पत्ती खेल लीन जाए।"

दूसर जने बोलेन - "तीन पत्ती मा मजा ना आये चला एक कउनो खेल खेला जाए जेहमा तीन चार जने होथिन।" उन्मैं से पहिला जने एक दूसर अमेठी वाले व्यक्ति से खेले के बारे पूछेन।

अमेठी वाले भैया कहें - "ना भैया ना, हम ई सब खेल से दूरिन रहीथा, ई सब जुआ आटय।" ई सुनि के हमाय तानी हंसी छूटि गय। हमका मुस्करात देखि, एक जने हमसे पूछेन - "आप तास खेलथिन?" हम कहा, "हाँ खेल लेयिथा।"

अब वै हमसे पूछेन तीन पत्ती खेलिहें? हम कहा हुंका तीन पत्ती नाही आवत मुला हम "29" खेल लेईथा। 29 के नाम सुनते मान उनहू दुइनौ जने खुस होइ गयेन मुला ई खेल खेले के बरे 4 जने चाहे ई सोच के तनी दुखी होइ गएन।

अब हम सब अमेठी वाले भैया का देखेन और उनसे पूछेन। वै साफ साफ नहकार देहेन काहे की वै ताश का जुआ समझथें। बहुत समझावे के बाद वै मानि गएन।

अब हम सब मिल के उनका खेल समझावै लागे। एही बहाने एक आध खेल खेल लीन गा। अमेठी वाले भैया का तनी समय लाग मुला ३-४ खेल खेले के बाद उनका खेले के तरीका समझि आई गवा।

अब रात होत होत हम सबे 10-12 बार खेला खेल चूका रहे। अब अमेठी वाले भैया का कउनो सहायता के जरुरत नाही परत रही, वै अपुनै चाल चल देत रहेन। आस पास के बाकी यात्री हम सबकै खेल देख के मजा लेत रहेन।

लगभग रात के ९ बजे हम सबे खाना खाय के पहुडि गए। कुल मिलाय के ट्रेन मा पहिला दिन बढ़िया से कटिगा। सबेरे हम सब सोवत रहे तौ हम सबे का जानत अहैं के जगाइस? अमेठी वाले भैया!

उहो काहे बरे? ताश खेले के बरे!

हम तौ उनकै बतिया सुनि के चौंकि गए। काहे की जउन आदमी काल तक ताश का जुआ कहत रहन ओहका अचानक एक्कै दिन मा ताश के इतना नसा चढ़ि गा रहन की ओहका सबेरे सबेरे ताश खेले का बा।

हम सब मुँह हाथ धोय के आये और फिन खेल सुरु भा ताश कै। औ अबकी बार ताश के पत्ता बाटेन अमेठी वाले भैया। बस फिर का? 8-10 राउंड और खेल लीन गा। दुपहर होइ गय रही और अब इलाहबाद आवै वाला रहा।

इलाहबाद अउतै मान 4 मा से 2 जने उतरि गएन और बचि गए हम औ अमेठी वाले भैया। बस फिर हम सब आपन गाँव घर के तनी बात कहे औ हम उतरि गए प्रतापगढ़ मा औ अमेठी वाले भैया का आपन नंबर दीन, ओनहू के नंबर लेहे औ आखिर मा ओनका अलविदा कीन।

वै बाकी दुइ जने तौ नाही मुला अमेठी वाले भैया से अबऔ कबो कभार बात-चीत होइ जात है औ हम दुइनौ जने आपन ट्रेन कै यात्रा का याद कै के ठहाका लगाय लेईथा।

Interesting Fact: In Awadhi culture, a journey (Yatra) is often measured not by miles, but by the "Kissa" (stories) and connections made along the way.

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